Sep 15, 2017

अदब-ए-रुख़सत

न जाने तक़रार के थे,
या इज़्हार के लम्हे वो... 

मेरी हर बात में, 

हर बार 
जब तुम दख़ल देते थे... 

अनजाने ही सही, 

तुम जो....
हर अधूरी नज़्म को मेरी, 
फिर अपनी सी...
शक़्ल देते थे 

और इश्क़ की बेफिक्री में,

वो जब...
हम रोज़ कुछ ठान लेते थे 
फिर तुम..
उसके अधूरे रह जाने का भी,
सिर्फ मुझपे ही इलज़ाम देते थे

कभी खंज़र को रंग देते थे 

और मुझे, 
मेरे ही ख्वाबों में,
मेरे अपनों से जंग देते थे 

मुझे रिश्तों में उलझा के, 

बड़ी ही मासूमियत से...
तुम जराफत के तीरों से,
मेरी रूह को भी रंज देते थे 

शुक्रिया करूँ,

या शिकायत तुमसे?

क्यों ऐसे खुदगर्ज़ थे तुम?

जो मेरी बेबाक सी चाहत को 
यूँ क़ैद करके ताह-उम्र 
उन मौसमों में, मंज़रों में, 
मायूसी के उन पिंजरों में ...

मगरूर से हो के, 

ले रुख़सत !
एक रोज़ तुम, 
दूर कहीं चल पड़े..... 

मैं लम्हें समेटती रही

तुम इश्क़ उधेड़ते गए 
मैं चिरागों में जलती रही 
तुम अधेरों में बढ़ते गए 

की कोशिशें नाकाम सी.

हसरत थी भूल जाऊं सब, 
फुर्सत ना दी, 
परवाह ने तेरी 
सो तेरी यादों से लड़ते गए  

अश्कों पे ना..

मेरा ज़ोर था
ये करवटें बदलते रहे 

फिर एक रोज़,

खुद चाँद,
मेरे पहलु में आया, 
मेरी उदासी देख , 
वो भी मुझपे मुस्कुराया 
मेरी बेरुखी को गुदगुदाया 
और अपनी चांदनी  के ,
उस उजले से आँचल से ,
मेरे हौंसलों को ,
उसने फिर जगाया 

फिर अब्र की आहट लिए 
हम  उम्र की रफ़्तार से,
की मंज़िलों से गुफ्तगू 
और मैकदों  में जा मिले 

तू आजाद है ,

मेरे हर इलज़ाम से, 
मैं आज़ाद  हूँ, 
तेरे नाम से 
न तुझको थी ये इल्तेज़ाह 
फिर भी मेरे माशूक हम ,
ले अदब-ऐ-रुख़सत 
के सिलसिले ,
सोचा  की  हम ठहरे बहुत 
अब चाहत है, हम भी उठ चलें 




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