Aug 9, 2017

सब बदले से लगते हैं

मैं ....
यूँ ही नहीं कहती,
सब बदले से लगते हैं, मायने.......

मैं यूँ ही नहीं कहती....
कि मायने, बदल गए हैं अब 
दिल दुखता है सोच के, 
क्या होगा रब ,इसका सबब ?
सब बदले से लगते हैं, क्यों ये मायने ?

वो शब्दों के हों अर्थ, 
या कि....
वो इंसान की जुबां हो ,

वो शब्दों के हों अर्थ, 
या इंसान की जुबां हो ,
नहीं कोई तरकीब, जिससे
सच की कहीं ,पहचान हो ...
न आये ,जो यक़ीन, 
तो खुद से तलाशो .........
अपनी ही उँगलियों से.
आहिस्ता!!

तुम खुद तराशो.
खुद कि ही नींदो में, तेरे सपनों के मायने, 
या फिर यूँ उलझे ?
उलझे से रिश्तों में, अपनों के मायने,
सब बदले से लगते हैं, क्यों ये मायने ?


वो तो जानते नहीं, थे 
इजाज़त के कायदे....

वो ,जो जानते नहीं हैं ,इजाज़त के कायदे, 
रसूख़ की ,मीनार से ,देखना चीखेंगे...

रसूख़ की मीनार से चीखेंगे, 
घुंघट के ,बुरके के फायदे 
क्या करें?  
वक़्त की नज़ाकत से ,जुड़ें हैं अब.
जुड़ें हैं अब ,सारे आबरू के वायदे .

हौंसला कर, ज़रा पूछो .....
ज़रा पूछो, सियासी पहरेदारों से
क्या होते हैं यहां ,इज्जत के मायने?
कुछ पोशाक संभालेंगे,और...
मुस्कुराके नज़रें गिरा लेंगे  
फिर पैमाने ऐसे बाधेंगे, की 
शर्मसार कर दें ,खुद  इनको ..
आज इनके की,आईने 
सब बदले से लगते हैं, यूँ ये मायने..

शोर की आवाज़ में, 
वो गुमसुम खड़ा है सच...

शोर की आवाज़ में, 
वो गुमसुम खड़ा है सच,
ख़ामोशी को कभी देखा है, ऐसे बाज़ारों में ?
क्यों मायूस है वो, हुकूमत के साये में ?
यूँ ही नहीं लगते हैं अब ,बदले से ये मायने ...

कभी आरंभ के ,
तो कहीं अंत के मायने, 
स्वतंत्रता के,
और प्रजातंत्र के मायने ...
सब बदले लगते हैं....
क्यों बदले लगते हैं?

हो रसूल या संत के सामने ,
हो रूहानियत का जिक्र ,
या इबादत के मायने....
शफ़ाक़त से महरूम हैं, 
आज शराफ़त के मायने 
जैसे किसी दायरे के हों फिक्रमंद...
सब बदले से लगते हैं, क्यों ये मायने ?

रहीम के, राम के,सम्मान के मायने 
कब जुदा हुए,यहां ईमान के मायने ?
गीता के और क़ुरान के मायने 
देश भक्ति, राष्ट्रगान के मायने

क्या आज इंसान से भी ऊपर हैं ?
देशप्रेम के,और हिंदुस्तान के मायने ...

यूँ ही नहीं कहती, मैं ....
यूँ ही नहीं कहती, 
मायने बदल गए हैं अब,
वो जो साथ थे हमारे, 
कितने बदल गए हैं सब ... 





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