Apr 14, 2017

सच और मैं (एक वार्तालाप)

ये संवाद है हमारी सोच और सच के बीच का...अक्सर जब हमें कुछ प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते, तो हम इसी विडम्बना में रहते हैं की "आखिर सच है क्या? ". इन्ही विचारों के आदान प्रदान को, मैंने इस कविता के माध्यम से व्यक्त करने की कोशिश की है  -

मैं: 
समकक्ष है, पर विपक्ष सी ...
हर रचना में यूँ व्याप्त भी ..
फिर सोच से कैसे कहूँ?
ना छू सकूं, इसको कभी

सच (अपना परिचय देते हुए) :
बहती नदिया की धारा सुन, सिर्फ ग्रंथो से व्यवहार नहीं
सच से तो जीवनशैली है, सच का कोई अन्य आधार नहीं

संवादों में है धैर्य सा, यूँ स्वतंत्र है इसकी प्रकृति
विवाद से आज़ाद ये, इसको ना चाहे स्वीकृति

आकार बिन, श्रृंगार बिन, है दिव्य ये, संपूर्ण भी
इस बात में रहस्य क्यों? जब है सर्वदा, ये सर्वस्व भी..

मैं (फिर कुछ सोचते हुए)
है ये ज्ञात तो, पर अज्ञात भी
परिभासा है, ये जो सत्य की ........


(आगे समझाते हुए):
सच तो गति है, ऊर्जा भी,
सच राँझा भी है, मिर्ज़ा भी
सच का प्रतीक गन्धर्व नहीं
सच को ढूँढना संधर्भ नहीं
धर्म सच नहीं, सच ही धर्म है
सच शब्द नहीं, सच कर्म है
सच अद्वितीय सी है चेतना,
इसके ना मत को भेदना....

सच व्याप्त है, पर्याप्त है, सच ॐ है, अर्थात है
सच में संझोया ज्ञान है, ये सच ही जीवनदान है.

मैं (हिचकिचाते हुए):
मैं इससे अवगत क्यों नहीं?
है सच अगर, जो तुमने कही ...

सच पास आया  (और मुस्कारे के कहने लगा ):
सच सुक्ष्म है, विशाल भी,
सच है मृतक का काल भी
सच हर जीवन में सांस है,
जिससे है आस्था, विश्वास है,
सच ना क्रोध, न अट्टहास है
सच प्रेम है, और मिठास है....

ये तलाश भी, एक संकल्प की
जिस तक है पहुंचे अल्प ही  
सच है साधना,बस ज्ञान की
रहस्य इसमें कुछ नहीं .....

सच ज्ञान है, सच प्राण है,
सच मानवता का मान है!!!