Sep 20, 2017

सुकून रहने दो

रेशम में लिपटे हुए, वो करते हैं यूँ,
उलझनों से आज़ादी की ख्वाइश
जैसे लोहे की जंजीरों ने की हो,
अपने ही किसी क़ैदी के.......
रियाही की फरमाइश

वो जो बेजार सा आइना है,
तेरे दीवार की रौनक समेटे
कहीं दफ़्न है, उसके बज़्म में
मेरे माहरूफ़ तेरी,
साज़ की नुमाइश

कभी इत्मीनान में हो तो,
उसकी वो दीवार बदलना
अपनी देहलीज़ से दूर
किसी बेगानी हद में, वरना
फिर शायद,
तुम्हारे अक्स में ही,
क़ैद रह जाए,
तुम्हारी अहमियत के,
राज़ का तज़ुर्बों में ढलना

फिदरत है, ये फिक्र की
वो ज़िक्र के अंदाज़ में,
हर दफा बुनती है तिशनगी
पर फासलों में ही रिहा होती है,
जो क़ैद है, ये अधूरी सी ज़िन्दगी

जाते लम्हों को गुज़र जाने दो,
आते लम्हों पे ठहरना नहीं
स्याही से थोड़ा जूझ लेना,
हो दरकार जो गुमनामी की,
किस्सों से आज़ाद रहना,
जो हरकत में हो ज़िन्दगी
क्यूंकि महरूम रह जातें हैं,
अक़्सर
वो जो क़ैदी वक़्त के हों

हमें ताज्जुब-ऐ-आरुफ़ पे नहीं,
महफूज़-ऐ-मिन्नत से होती है
या तो यूँ करते हों गुफ़्त्गू
अनजान रहके, मैं और तू
की ज़ानिब-ऐ-मंज़िल
किसी ख्वाब सी हो,
जिसपे नुसरत-ऐ-दस्तख़
बेआवाज़ ही हो

क्या मुमकिन होगा?
रौशनी में तपिश ना हो
चाहतों में खलिश न हो,
और, ना रही हो
सिकंदर से,किसी को रंजिश
मुमकिन, इत्तेफ़ाक़ को भी नहीं
की झूठ पे चिलमन ना हो
या फिर,
दस्तूर-ऐ-तजवीज़ में शिकन

मंसूबों को मज़लिस से महरूम रहने दो
दो पल ही है ज़िन्दगी,जरा सुकून रहने दो 

Sep 15, 2017

अदब-ए-रुख़सत

न जाने तक़रार के थे,
या इज़्हार के लम्हे वो... 

मेरी हर बात में, 

हर बार 
जब तुम दख़ल देते थे... 

अनजाने ही सही, 

तुम जो....
हर अधूरी नज़्म को मेरी, 
फिर अपनी सी...
शक़्ल देते थे 

और इश्क़ की बेफिक्री में,

वो जब...
हम रोज़ कुछ ठान लेते थे 
फिर तुम..
उसके अधूरे रह जाने का भी,
सिर्फ मुझपे ही इलज़ाम देते थे

कभी खंज़र को रंग देते थे 

और मुझे, 
मेरे ही ख्वाबों में,
मेरे अपनों से जंग देते थे 

मुझे रिश्तों में उलझा के, 

बड़ी ही मासूमियत से...
तुम जराफत के तीरों से,
मेरी रूह को भी रंज देते थे 

शुक्रिया करूँ,

या शिकायत तुमसे?

क्यों ऐसे खुदगर्ज़ थे तुम?

जो मेरी बेबाक सी चाहत को 
यूँ क़ैद करके ताह-उम्र 
उन मौसमों में, मंज़रों में, 
मायूसी के उन पिंजरों में ...

मगरूर से हो के, 

ले रुख़सत !
एक रोज़ तुम, 
दूर कहीं चल पड़े..... 

मैं लम्हें समेटती रही

तुम इश्क़ उधेड़ते गए 
मैं चिरागों में जलती रही 
तुम अधेरों में बढ़ते गए 

की कोशिशें नाकाम सी.

हसरत थी भूल जाऊं सब, 
फुर्सत ना दी, 
परवाह ने तेरी 
सो तेरी यादों से लड़ते गए  

अश्कों पे ना..

मेरा ज़ोर था
ये करवटें बदलते रहे 

फिर एक रोज़,

खुद चाँद,
मेरे पहलु में आया, 
मेरी उदासी देख , 
वो भी मुझपे मुस्कुराया 
मेरी बेरुखी को गुदगुदाया 
और अपनी चांदनी  के ,
उस उजले से आँचल से ,
मेरे हौंसलों को ,
उसने फिर जगाया 

फिर अब्र की आहट लिए 
हम  उम्र की रफ़्तार से,
की मंज़िलों से गुफ्तगू 
और मैकदों  में जा मिले 

तू आजाद है ,

मेरे हर इलज़ाम से, 
मैं आज़ाद  हूँ, 
तेरे नाम से 
न तुझको थी ये इल्तेज़ाह 
फिर भी मेरे माशूक हम ,
ले अदब-ऐ-रुख़सत 
के सिलसिले ,
सोचा  की  हम ठहरे बहुत 
अब चाहत है, हम भी उठ चलें 




Aug 17, 2017

Important ain't a Thing

The luscious rose gardens that you laid
The six yard drapes or the twisty braid
The games of love & lust, you played
To lock me up, in your fancy cage
But it's my song. To my tunes, I played..
Important is not, what you men made...

Its the change, now you see in my chase

The push I made, all through this phase
It's the free motion, in swing of my thumb, 
That tells u, NO, I would be no more, numb
No more tricking me, into another facade
For I have those bills, last month you paid
For the spas & dinners, with women you had
This time, I am just sorry. I am no more mad...

It's not a solitaire, with-all-that-bling

Or the silken scarves, to which they cling
That pricey linen, that you always bring
To make your way, through my G-string
Let me confess, had it been better, a fling 
Oh Darling! since important ain't a thing...

Its the persistence in my stare,

With the waves, riding my hair
Its the freak, in my tone
That which shivers your bone 
No feeble shrills, No fancy drills
I know what you've been up to
For your want of, cheap thrills 

It's the respect that I sought, you chose to ignore

While narrating the tales, of your female folklore
But baby, do hear me, just one last time
My whims & fancies don't cost a dime
I tried being there for you, all this time
And you just took it, with a dash of lime

Now I owe myself, the curves on my lips

I taught myself, how to park my ships
I love it way more, in these solo trips
I can rip my jeans and ignore your quips
I am in high spirits, now being this single woman
My glee, you see, doesn't need the arms of a man 

It's the power of my smiles

My journey, all these miles
Its a teeny-weeny toast, that now I rose
With the group of friends, I only chose 
And do notice my sleeves, the way I roll
The roast I send, enough to tickle your soul
My freedom I define, it's the way I host 
No more, chained by your foghorn boast 

My choice, My voice, My freedom I reclaim

As I throw off your ring, not worth the pain
Its my happiness pervert, that you cant bring
Honey, hope you got, 'Important ain't a Thing'





Aug 14, 2017

Krishna Katha

The word "Krishna" or "कृष्णा", has a beautiful connotation to it. My memory of Krishna stretches back to as old as some thirty years. Without consciously attempting or acknowledging, I had literally assumed the favorite pose of Krishna. Be it temples, or general conversations,school punishments or assembly gatherings, waiting in queues or any activity that demanded me to be upright, I was always standing cross legged as if ready to play his favorite flute aka 'bansuri'. The best thing, in the growing up years Mahabharata & Bhagwad Gita shlokas added more information to my repository of Krishna, 'the unconscious love'. In grade third or fourth, I got to know my adorable grandma shared the same name. And thus this saga of unconscious love for Krishna, started. When i was in my late twenties, I started visiting ISKCON & learnt further about him, his beliefs & teachings. Krishna, is absolute happiness,pure bliss. One look at him, and the only emotion that encapsulates you all around is a pristine ecstasy, a soul quenching happiness & a super illuminated smile. Such is his, aura. It's on this auspicious occasion of Krishna Janmashtami that I would love to share with the world, all that I got enlightened to, in these years:
  1. Our mind can be the best friend yet the worst enemy. Master it right!
  2. This mind is fickle and so, it won’t obey us but every time, it misbehaves, let’s not forget to use the intellect at our discretion and balance it back.
  3. With good work, you can be sure of never coming to a bad end.
  4. Set your heart upon the work, not the reward.
  5. To always live in freedom, never get attached to results. The action as a result, won’t cling to you either.
  6. We are made by our beliefs. As we believe, so are we.
  7. Austerity of speech consists in speaking truthfully and beneficially. Avoid speech that offends.
  8. Know that the three gates to self –destruction are Anger, Greed & Lust.
  9. Only when we can give up all attachments, can we really love others. This is the kind of love that is pure and divine.
  10. When we can truly empathize with others around us, we attain a state of highest spiritual union.
  11. Let not ego, envy, greed and lust be your guiding forces. Act with compassion, devotion, humility & love.
  12. True knowledge and Pure Love can only be attained by a Human being.
As I grow and go, I will keep learning, deciphering & submerging my soul, in this purest form of eternal happiness. 

Radhe Radhe! 
Happy Janmashtami 




Aug 9, 2017

सब बदले से लगते हैं

मैं ....
यूँ ही नहीं कहती,
सब बदले से लगते हैं, मायने.......

मैं यूँ ही नहीं कहती....
कि मायने, बदल गए हैं अब 
दिल दुखता है सोच के, 
क्या होगा रब ,इसका सबब ?
सब बदले से लगते हैं, क्यों ये मायने ?

वो शब्दों के हों अर्थ, 
या कि....
वो इंसान की जुबां हो ,

वो शब्दों के हों अर्थ, 
या इंसान की जुबां हो ,
नहीं कोई तरकीब, जिससे
सच की कहीं ,पहचान हो ...
न आये ,जो यक़ीन, 
तो खुद से तलाशो .........
अपनी ही उँगलियों से.
आहिस्ता!!

तुम खुद तराशो.
खुद कि ही नींदो में, तेरे सपनों के मायने, 
या फिर यूँ उलझे ?
उलझे से रिश्तों में, अपनों के मायने,
सब बदले से लगते हैं, क्यों ये मायने ?


वो तो जानते नहीं, थे 
इजाज़त के कायदे....

वो ,जो जानते नहीं हैं ,इजाज़त के कायदे, 
रसूख़ की ,मीनार से ,देखना चीखेंगे...

रसूख़ की मीनार से चीखेंगे, 
घुंघट के ,बुरके के फायदे 
क्या करें?  
वक़्त की नज़ाकत से ,जुड़ें हैं अब.
जुड़ें हैं अब ,सारे आबरू के वायदे .

हौंसला कर, ज़रा पूछो .....
ज़रा पूछो, सियासी पहरेदारों से
क्या होते हैं यहां ,इज्जत के मायने?
कुछ पोशाक संभालेंगे,और...
मुस्कुराके नज़रें गिरा लेंगे  
फिर पैमाने ऐसे बाधेंगे, की 
शर्मसार कर दें ,खुद  इनको ..
आज इनके की,आईने 
सब बदले से लगते हैं, यूँ ये मायने..

शोर की आवाज़ में, 
वो गुमसुम खड़ा है सच...

शोर की आवाज़ में, 
वो गुमसुम खड़ा है सच,
ख़ामोशी को कभी देखा है, ऐसे बाज़ारों में ?
क्यों मायूस है वो, हुकूमत के साये में ?
यूँ ही नहीं लगते हैं अब ,बदले से ये मायने ...

कभी आरंभ के ,
तो कहीं अंत के मायने, 
स्वतंत्रता के,
और प्रजातंत्र के मायने ...
सब बदले लगते हैं....
क्यों बदले लगते हैं?

हो रसूल या संत के सामने ,
हो रूहानियत का जिक्र ,
या इबादत के मायने....
शफ़ाक़त से महरूम हैं, 
आज शराफ़त के मायने 
जैसे किसी दायरे के हों फिक्रमंद...
सब बदले से लगते हैं, क्यों ये मायने ?

रहीम के, राम के,सम्मान के मायने 
कब जुदा हुए,यहां ईमान के मायने ?
गीता के और क़ुरान के मायने 
देश भक्ति, राष्ट्रगान के मायने

क्या आज इंसान से भी ऊपर हैं ?
देशप्रेम के,और हिंदुस्तान के मायने ...

यूँ ही नहीं कहती, मैं ....
यूँ ही नहीं कहती, 
मायने बदल गए हैं अब,
वो जो साथ थे हमारे, 
कितने बदल गए हैं सब ... 





May 12, 2017

Quote for the Day (1)

When your poison is remembrance,
You would choose not to flaunt
It’s the flesh, which seeks attention....
The soul has no wants!!

~ SIA SMITA 

May 8, 2017

THE TEEN REALMS (A journey thru dreams...)

I woke up to a dream,
A dream so disturbing....
Of notebooks and classrooms and teachers to pals
So much I did, only to win through the exam halls
How my dreams, suddenly turned so redundant?
And still, I could wear that smile as resplendent
Night after night, I kept closing my jaded eyes...
To dream of a hallway of fame with that prize
With thunders of applause and charms abundant
And the sight of an oasis, beyond the sand

The transition was soar, like never before
My happiness quotient, now defined by scores
Spells of envy had quietly been seeded,
We would say - 
We are friends, when we actually competed
Where did it come from, how could it brew?
My dreams were clueless, just like me and you

I was traveling cities, had to beat some shit
‘To compete, to be....never should I quit’
I slept with eyes open for the board's score beat
Only to wake up amidst, my summer retreat

That innocence had sublimed, I was a frantic spirit
Exit "Adolescence", I had grown up to be a misfit 

RAKING RIGOROUSLY, TO BE ABLE TO REMIT 


THE CHILD IN ME (A journey thru dreams..)

I woke up to a dream,
A dream so pristine....

Between placid meadows and floral scents
The arty laces encasing all the presents
With luscious lavenders and riant roses
The kind of pinks from poems and prose’s
Elaborate brocades outlined my linen
Silk ribbons holding, my hair insane

My Barbie dolls and those teddy bears
I held ‘em close, for losing.... I feared

That revealing smile, I always wore on my lips
As they kissed and dressed me, fastening the zips

Zips that were only meant to seal....
My thoughts, my fate, my plans and fears
My freedom of speech in the coming years
And to succumb silently, without any tears

I knew of nothing, no hate, no lust
As I lay playing with the silver dust
“Greet and Smile”, was always a must
This world is good, so you must trust

I was there, now heading into my teens
Look through me, to be able to believe in

LOOK THROUGH ME...TO BE ABLE TO BELIEVE IN!!!

May 7, 2017

THE STILL NIGHT

It’s dark again…..
That time around, when the bejeweled night sky would ascend
Wearing an illuminated cloak, swiftly wiping every nook and corner
And then.....
Rolling out a salver
It would elegantly spread out, some lustrous delicacies to attend
With its tiny, twinkling and sturdy stars
Amassed into galaxies, near and far....
















Wrapped in the celestial ecstasy and charms
Some hearts seem busy, plaiting silver yarns
Into a pergola of plummeting peonies and pansies
To titivate altars of unspoken-unheard fantasies

And through my nerves, creeps in a mystic breeze
Abolishing all hurting and smoothening all crease

Whilst the pearly bubble molds swiftly into a crescent
The soul encaged within, escapes my naive skeleton, 
Fighting vehemently the muscles, ligaments and tendons
Unwrapping to float, like passing flames of the lantern

Now numbness prevails.. with all its might
Is it the death of a day or infancy of a night?

There is but only stillness around,....

NO MORE LIGHT, NO SOUND!!

Apr 14, 2017

सच और मैं (एक वार्तालाप)

ये संवाद है हमारी सोच और सच के बीच का...अक्सर जब हमें कुछ प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते, तो हम इसी विडम्बना में रहते हैं की "आखिर सच है क्या? ". इन्ही विचारों के आदान प्रदान को, मैंने इस कविता के माध्यम से व्यक्त करने की कोशिश की है  -

मैं: 
समकक्ष है, पर विपक्ष सी ...
हर रचना में यूँ व्याप्त भी ..
फिर सोच से कैसे कहूँ?
ना छू सकूं, इसको कभी

सच (अपना परिचय देते हुए) :
बहती नदिया की धारा सुन, सिर्फ ग्रंथो से व्यवहार नहीं
सच से तो जीवनशैली है, सच का कोई अन्य आधार नहीं

संवादों में है धैर्य सा, यूँ स्वतंत्र है इसकी प्रकृति
विवाद से आज़ाद ये, इसको ना चाहे स्वीकृति

आकार बिन, श्रृंगार बिन, है दिव्य ये, संपूर्ण भी
इस बात में रहस्य क्यों? जब है सर्वदा, ये सर्वस्व भी..

मैं (फिर कुछ सोचते हुए)
है ये ज्ञात तो, पर अज्ञात भी
परिभासा है, ये जो सत्य की ........


(आगे समझाते हुए):
सच तो गति है, ऊर्जा भी,
सच राँझा भी है, मिर्ज़ा भी
सच का प्रतीक गन्धर्व नहीं
सच को ढूँढना संधर्भ नहीं
धर्म सच नहीं, सच ही धर्म है
सच शब्द नहीं, सच कर्म है
सच अद्वितीय सी है चेतना,
इसके ना मत को भेदना....

सच व्याप्त है, पर्याप्त है, सच ॐ है, अर्थात है
सच में संझोया ज्ञान है, ये सच ही जीवनदान है.

मैं (हिचकिचाते हुए):
मैं इससे अवगत क्यों नहीं?
है सच अगर, जो तुमने कही ...

सच पास आया  (और मुस्कारे के कहने लगा ):
सच सुक्ष्म है, विशाल भी,
सच है मृतक का काल भी
सच हर जीवन में सांस है,
जिससे है आस्था, विश्वास है,
सच ना क्रोध, न अट्टहास है
सच प्रेम है, और मिठास है....

ये तलाश भी, एक संकल्प की
जिस तक है पहुंचे अल्प ही  
सच है साधना,बस ज्ञान की
रहस्य इसमें कुछ नहीं .....

सच ज्ञान है, सच प्राण है,
सच मानवता का मान है!!!